पर्यावरण प्रेमियों के लिए अच्छी खबर: देहरादून में अब सुरक्षित हैं गिद्ध, JoTT में हुआ खुलासा

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देहरादून। पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक अच्छी खबर है। जानवरों की लाशों के डंप को दूर किया गया तो हाई टेंशन बिजली के करंट से मरने वाले गिद्धों की तादाद कम हो गई। जानी-मानी वैज्ञानिक शोध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा’ (JoTT) के ताजा अंक में एक अहम अध्ययन प्रकाशित हुआ है। अध्ययन से यह बात सामने आई कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पशुओं के शवों के डंप को हाई-टेंशन बिजली लाइन के ढांचे से 2.4 किमी दूर हटाने से इन बड़े पर्यावऱण के सफाईकर्मी पक्षियों को एक और बड़े खतरे यानी करंट लगने से होनी मौत से बचाया जा सका है।

जानवरों की लाशों का डंप हटाया तो करंट से बची गिद्धों की जान

गिद्धों की करंट से होने वाली मौत पर किए गए इस अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों में जावेद अनवर, यश वर्धन सिंह सेंगर, बिकाश घिमिरे, वोनचानो नगुली, हेमम रामा नंदा, ताशी पी. दोरजी, अंकित शर्मा, अक्षय जैन, सास बिस्वास, अरुण कुमार और एम. मुजाहिद शामिल हैं। अध्ययन में देहरादून के सुद्धोवाला क्षेत्र में मई 2011 से फरवरी 2014 के बीच किए गए 34 सर्वेक्षणों किया गया और गिद्धों की करंट से मौत का दस्तावेजीकरण किया गया। इस अध्ययन में इस क्षेत्र में आने वाले पांच प्रजातियों के 743 गिद्ध दर्ज किए गए। अध्ययन अवधि के दौरान, हाई-टेंशन बिजली ट्रांसमिशन ढांचो मसलन बिजली लाइन व टावर के पास करंट लगने से 46 गिद्धों के शव मिले। देखे गए गिद्धों की तुलना में मृत्यु का सबसे अधिक अनुपात हिमालयन ग्रिफॉन में दर्ज किया गया, उसके बाद यूरेशियन ग्रिफॉन और सिनेरियस वल्चर का स्थान रहा। हालांकि सर्वेक्षण गैर-व्यवस्थित आधार पर किए गए थे, लेकिन देखी गई मृत्यु की घटनाओं की संख्या से पता चला है कि करंट लगना गिद्धों जैसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले सफाईकर्मी पक्षियों के लिए एक बड़ा स्थानीय खतरा हो सकता है।

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सर्वेक्षण के बाद मिले सुझावों के बाद स्थानीय अधिकारियों ने अप्रैल 2015 में पशुओं की शव डंपिंग साइट को खतरनाक बिजली ढांचे से लगभग 2.4 किमी दूर स्थानांतरित कर दिया। बाद में देखा गया कि इसके बावजूद से गिद्ध नई डंपिंग साइट में आते रहे। डंप के स्थानांतरण के बाद की सीमित निगरानी के दौरान वहां कोई मृत्यु की घटना दर्ज नहीं की गई। स्थानांतिरत साइट पर अन्य शिकारी पक्षी प्रजातियां, जिनमें काली चील और क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल भी देखी गईं। अध्ययन में शामिल देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक जावेद अनवर के मुताबिक अध्ययन के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि शव डंपिंग साइटों को खतरनाक बिजली ढांचे से दूर ले जाना करंट लगने के जोखिम को कम करने के लिए एक व्यावहारिक संरक्षण उपाय हो सकता है और इसे संभावित रूप से अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है हालांकि, 2015 के बाद कोई अन्य अध्ययन नहीं किया गया है।

गिद्ध सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में से एक

असल में गिद्ध भारत ही नहीं दुनिया भर में सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में से एक हैं। गिद्धों आबादी में एशिया और अफ्रीका में कई मानवीय कारणों से भारी गिरावट आई है। हालांकि पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली डिक्लोफिनेक जैसी नॉन-स्टेरायडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं गिद्धों की मौत का बड़ा कारण रहा है। डिक्लोफेनाक से उपचारित मृत पशुओं को खाने से गिद्धों के गुर्दे फेल हो जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है। देश में गिद्धों की आबादी को बचाने के लिए सरकार ने 2006 में मवेशियों के लिए डाइक्लोफेनाक की बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। भोजन की कमी और आवास का नुकसान भी भारत में गिद्धों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती हैं लेकिन बिजली के ढांचे भी उनके लिए बड़ा खतरा रहे हैं। यह बात अलग है कि बिजली के ढांचे से करंट से गिद्धों की मौतों को सबसे कम रिपोर्ट किया जाता रहा है।

उत्तराखंड में पाए जाते हैं भारत की 9 में से 8 प्रजातियों के गिद्ध

बता दें कि भारत में पाई जाने वाली 9 में से 8 प्रजातियों के गिद्ध उत्तराखंड में पाए जाते हैं। वर्ष 2008 के बाद से उत्तराखंड में गिद्धों की किसी आधिकारिक गणना के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। वर्ष 1990 और 2000 में ब्रिटिश पक्षी विज्ञानियों ने एक सर्वे किया था। इसमें उन्होंने पाया कि भारत में पिछले 10-15 सालों में व्हाइट बैंड गिद्धों की तादाद में 96 प्रतिशत तक कमी आई है, जबकि Long-billed Vulture की तादाद में 92 प्रतिशत तक की गिरावट आई थी।

उत्तराखंड में 2007 से 2008 तक घट गए थे 346 गिद्ध

प्रदेश में पर्यावरण की साफ-सफाई कर प्रकृति की सेवा करने वाले गिद्धों की संख्या वर्ष 2007 में जहां के 5066 थी। जुलाई 2008 में उनकी तादाद घट कर महज 4720 ही रह गई थे। यानी सालभर में प्रदेश में गिद्धों की संख्या में 346 की कमी आ गई थी। बता दें कि वर्ष 2007 के उत्तरार्ध में भारत सरकार की ओर से बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BHNS) व चेन्नई के सालिम अली सेंटर फॉर आर्नियोलॉजी ने देश में पहली बार गिद्धों की गणना की, जिसमें प्रदेश के वन्यजीव प्रभाग की भी मदद ली गई थी। 2007 की गणना के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 5066 गिद्ध थे। इनमें संरक्षित क्षेत्रों में 1,272 और बाहर 3,794 गिद्ध शामिल थे। 2008 के बाद से प्रदेश में गिद्धों की गिनती नहीं हुई है।

पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा गिद्ध

उत्तराखंड के वन विभाग की 2008 की पक्षी गणना के मुताबिक अलकनंदा, चंपावत, नरेंद्रनगर, कालसी भूमि संरक्षण वन प्रभागों, कार्बेट और कालागढ़ टाइगर रिजर्व में कोई गिद्ध नहीं पाया गया। पिथौरागढ़ वन प्रभाग में सबस ज्यादा 573 गिद्ध पाए गए, अन्य वन प्रभागों में उत्तरकाशी में 473, गढ़वाल में 365, टिहरी में 330, राजाजी राष्ट्रीय पार्क में 282, तराई केंद्रीय में 261, बद्रीनाथ में 245, हरिद्वार में 245, केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग में 242, नैनीताल में 201, लैंसडाउन में 196, अपर यमुना में 163, गोविंद वन्यजीव विहार में 149, बागेश्वर में 146, सिविल सोयम में 133, देहरादून में 131, मसूरी में 129, टौंस में 99, चकराता में 96, नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में 85, तराई पश्चिम में 74, तराई पूर्वी में 65, रुद्रप्रयाग में 21, हल्द्वानी में 10 और रामनगर में महज छह गिद्ध पाए गए थे।

 

 

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