केंद्र की हाई लेवल कमेटी ने मांगा 15 साल का धर्मवार डेटा, राज्य सरकारों की उड़ी नींद

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जनसांख्यिकी (Demographics) बदलावों का अध्ययन करने के लिए गठित केंद्रीय गृह मंत्रालय की हाई-लेवल कमेटी (HLCDC) के एक नए कदम ने राज्य सरकारों की नींद उड़ा दी है। इस हाई-लेवल पैनल ने राज्यों से पिछले 15 सालों का धर्म-वार (Religion-wise) डेटा मांगा है। अब परेशानी यह है कि राज्यों के पास इस तरह की कोई तैयार सूची ही नहीं है, क्योंकि आमतौर पर सरकारी विभाग इस आधार पर जानकारी रखते ही नहीं हैं।

केंद्र की हाई लेवल कमेटी ने मांगा 15 साल का धर्मवार डेटा

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद, 26 मई, 2026 को गृह मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अध्यक्षता में इस कमेटी गठन किया था। गृह मंत्रालय के तहत बनी इस समिति ने राज्यों के सामने 35 कड़े और पेचीदा सवालों की सूची रखी है। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और बौद्ध समुदायों से जुड़ा अलग-अलग डेटा मांगा गया है।

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पैनल ने इन बिंदुओं पर मांगी जानकारी

  • जन्म और वाहन पंजीकरण: पिछले 15 सालों में धर्म-वार जन्म और गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन का हिसाब।
  • स्कूल नामांकन और प्रॉपर्टी: स्कूलों में बच्चों के दाखिले और जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री का धर्म के आधार पर ब्यौरा।
  • धार्मिक स्थल: पिछले 15 सालों में बने मंदिर, मस्जिद, चर्च का जिला-वार डेटा और उनकी जीआईएस (GIS) मैपिंग की जानकारी।
  • आधार और वोटर आईडी: वोटर रजिस्ट्रेशन और आधार कार्ड में आए किसी भी असाधारण उछाल या बदलाव का ब्यौरा।

संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना आ रही आड़े

हालांकि अधिकारी इस पर खुलकर नहीं बोल रहे लेकिन दबी जुबान में उनका कहना है कि इन सवालों का जवाब देना लगभग असंभव जैसा है। भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे (Secular Construct) के कारण सरकारी विभाग धर्म के आधार पर नागरिकों का आंकड़ा जमा नहीं करते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, सिर्फ जन्म प्रमाण पत्र को छोड़कर जहां नवजात शिशु का धर्म दर्ज होता है अन्य किसी भी श्रेणी (जैसे वाहन पंजीकरण, प्रॉपर्टी या स्कूल दाखिले) में धर्म-वार रिकॉर्ड रखना संभव ही नहीं है।

अजीबो गरीब सवाल और ट्राइबल इलाकों पर नजर

समिति ने राज्यों से कुछ बेहद बारीक जानकारियां मांगी हैं जिसमें ऐसे जिलों की पहचान करना जहां स्कूल दाखिले के आंकड़े ऐतिहासिक जन्म दरों से मेल नहीं खाते हो, बिना किसी पारिवारिक रिकॉर्ड या पिछली पीढ़ी के जन्म प्रमाण पत्र के बनने वाले वोटर आईडी कार्डों का धर्म-वार ब्यौरा, सीमावर्ती इलाकों, औद्योगिक केंद्रों, शहरों और ट्राइबल इलाकों (5वीं और 6ठी अनुसूची वाले क्षेत्रों) में आबादी के धार्मिक संतुलन में आए बदलाव और आदिवासी (ST) समुदायों के बीच धर्मांतरण से जुड़ी इंटेलिजेंस रिपोर्ट और राज्य सरकारों द्वारा की गई कार्रवाइयां शामिल है।

कभी BJP ने ही किया था ऐसे कदमों का विरोध

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कवायद ने 2005 के ‘सच्चर कमेटी’ दौर की यादें ताजा कर दी हैं। जब तत्कालीन यूपीए (UPA) सरकार ने मुस्लिम समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए सच्चर आयोग बनाया था, तब 2006 में मुख्य विपक्षी दल के रूप में बीजेपी ने इसका कड़ा विरोध किया था। बीजेपी ने तब तर्क दिया था कि धर्म के आधार पर आंकड़ा जुटाना असंवैधानिक है और यह समाज को बांटने का काम करता है। आज हालात अलग हैं, लेकिन राज्यों के सामने चुनौती वही पुरानी है—आखिर जो डेटा कभी धर्म के आधार पर दर्ज ही नहीं किया गया, उसे रातों-रात कैसे तैयार किया जाए? यही वजह है कि केंद्र के इस नए आदेश से देश भर के प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा हुआ है कि इस आदेश की तामील करें तो करें कैसे ?

Khabar Uttarakhand – Uttarakhand News.

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